रणदीप हुड्डा ने बॉलीवुड की ‘झुंड मानसिकता’ पर कटाक्ष किया साउथ सिनेमा की तारीफ की

1. परिचय
बॉलीवुड के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक रणदीप हुड्डा अपनी बेबाक राय और दमदार अभिनय के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की ‘झुंड मानसिकता’ पर कटाक्ष किया और बताया कि कैसे बॉलीवुड एक सफल फिल्म के ट्रेंड को पकड़ लेता है और वैसी ही फिल्में बनाने लगता है।
रणदीप ने खास तौर पर इस बात पर प्रकाश डाला कि ‘स्त्री’ जैसी फिल्म की सफलता के बाद अब हर कोई हॉरर-कॉमेडी बनाने की होड़ में शामिल हो गया है। उन्होंने कहा कि हिंदी सिनेमा में मौलिकता की कमी है और यहां ज्यादातर फिल्में ट्रेंड से प्रेरित होती हैं, न कि मौलिक कहानियों पर आधारित।
इसके उलट उन्होंने साउथ इंडियन सिनेमा की तारीफ की और कहा कि वहां कंटेंट, नई कहानियों और प्रयोगों को ज्यादा महत्व दिया जाता है। यही वजह है कि आज साउथ की फिल्में अखिल भारतीय स्तर पर बड़ी सफलता हासिल कर रही हैं और दर्शकों का दिल जीत रही हैं।
बॉलीवुड की ‘झुंड मानसिकता’ और ट्रेंड को फॉलो करने की आदत

बॉलीवुड में जब भी कोई फिल्म सुपरहिट होती है, तो उसके जैसी दर्जनों फिल्में बनने लगती हैं। इंडस्ट्री का यही पुराना पैटर्न रहा है- जो हिट है, वो फिट है। लेकिन इस ‘झुंड मानसिकता’ के कारण मौलिकता और नए विचार कम होते जा रहे हैं। रणदीप हुड्डा ने इस ट्रेंड पर कटाक्ष करते हुए कहा कि अब ‘स्त्री’ के बाद हर कोई हॉरर-कॉमेडी बनाने में व्यस्त है। आइए जानते हैं कि हाल के सालों में बॉलीवुड ने कैसे बार-बार इसी ट्रेंड को फॉलो किया है।
‘स्त्री’ के बाद हॉरर-कॉमेडी का ट्रेंड
2018 में आई राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर की फिल्म ‘स्त्री’ एक अनोखा कॉन्सेप्ट था, जिसने दर्शकों को खूब हंसाया और डराया भी। फिल्म के सुपरहिट होते ही बॉलीवुड में हॉरर-कॉमेडी की बाढ़ आ गई। ‘रूही’, ‘भूत पुलिस’, ‘फोन भूत’, ‘भेड़िया’ जैसी फिल्में इसी ट्रेंड का नतीजा थीं। हालांकि, इनमें से कोई भी फिल्म ‘स्त्री’ जैसी मौलिकता नहीं दिखा पाई।
‘बाहुबली’ के बाद पीरियड ड्रामा की बाढ़
एसएस राजामौली की ‘बाहुबली’ सीरीज ने न सिर्फ भारतीय बल्कि वैश्विक सिनेमा में भी तहलका मचा दिया। इसकी सफलता के बाद बॉलीवुड में ‘पद्मावत’, ‘तान्हाजी’, ‘पानीपत’, ‘सम्राट पृथ्वीराज’ जैसी पीरियड ड्रामा फिल्में बनने लगीं। हालांकि, इनमें से कई फिल्में सिर्फ भव्य सेट, वीएफएक्स और स्टार पावर पर निर्भर रहीं, लेकिन ‘बाहुबली’ जैसी दमदार कहानी नहीं दिखा पाईं।
‘केजीएफ’ और ‘पुष्पा’ के बाद पैन-इंडिया फिल्मों का क्रेज
जब ‘केजीएफ’ और ‘पुष्पा’ ने पूरे भारत में तहलका मचा दिया, तो बॉलीवुड भी ‘पैन-इंडिया’ बनने की दौड़ में शामिल हो गया। अब हर दूसरी फिल्म साउथ स्टाइल के एक्शन और बड़े पैमाने पर बन रही है। हाल ही में ‘शमशेरा’, ‘आदिपुरुष’, ‘ब्रह्मास्त्र’ जैसी फिल्में इसी सोच के साथ बनीं, लेकिन कंटेंट की कमी के कारण ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाईं।
‘कबीर सिंह’ के बाद एंग्री रोमांटिक हीरो का ट्रेंड
‘कबीर सिंह’ (2019) की ब्लॉकबस्टर सफलता के बाद बॉलीवुड में ‘एंग्री यंग लवर’ टाइप के किरदारों की बाढ़ आ गई। अर्जुन रेड्डी की रीमेक ‘कबीर सिंह’ के बाद ‘तड़प’, ‘राधे श्याम’ जैसी फिल्मों ने इस आक्रामक रोमांस को दोहराने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुईं। बॉलीवुड को अब इस ट्रेंड-फॉलोइंग से बाहर निकलकर नई और अनूठी कहानियों पर ध्यान देना होगा, तभी वह दर्शकों को कुछ नया दे पाएगा।
साउथ सिनेमा की खासियत और इसकी सफलता के पीछे की वजह

बॉलीवुड जहां ट्रेंड को फॉलो करने में व्यस्त है, वहीं साउथ सिनेमा (तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम फिल्म इंडस्ट्री) अपनी मौलिक और दमदार कहानियों के कारण लगातार सफलता हासिल कर रहा है। कंटेंट, एक्सपेरीमेंट और लोकल टच की वजह से साउथ की फिल्में अब सिर्फ अपने राज्यों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि पूरे भारत और वैश्विक स्तर पर भी लोकप्रिय हो रही हैं। रणदीप हुड्डा ने इस बात पर भी जोर दिया कि साउथ इंडस्ट्री सिर्फ स्टार पावर को नहीं, बल्कि कहानी और सिनेमा को प्राथमिकता देती है।
1. अलग-अलग जॉनर के साथ एक्सपेरीमेंट
साउथ इंडियन फिल्में हमेशा नए जॉनर और स्टोरीटेलिंग के साथ एक्सपेरीमेंट करती हैं। हर साल हमें एक्शन, साइंस-फिक्शन, माइथोलॉजी, हॉरर, थ्रिलर, पीरियड ड्रामा जैसी नई और अनोखी कहानियां देखने को मिलती हैं। उदाहरण के लिए:
‘आरआरआर’ (एक्शन-ड्रामा)
‘कंटारा’ (मिथोलॉजिकल-थ्रिलर)
‘माइकल’ (नियो-नोयर एक्शन)
‘विक्रम’ (थ्रिलर)
‘जनता गैराज’ (इकोलॉजिकल-ड्रामा)
2. कंटेंट से प्रेरित और मौलिक कहानियों पर ध्यान दें
साउथ इंडस्ट्री सिर्फ बड़े सितारों पर निर्भर नहीं है, बल्कि उनकी प्राथमिकता मजबूत स्टोरीटेलिंग है। फिल्में स्थानीय भावनाओं, गहरी भावनाओं और यथार्थवादी किरदारों से भरी होती हैं, जिससे दर्शक उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं। ‘केजीएफ’, ‘पुष्पा’, ‘बाहुबली’, ‘विक्रांत रोना’ जैसी फिल्में इसका बेहतरीन उदाहरण हैं।
3. लोककथा और संस्कृति से जुड़ी कहानियां
साउथ सिनेमा अपने क्षेत्र की जड़ों और संस्कृति से जुड़ी कहानियां पेश करने में माहिर है। ‘कंटारा’ ने कर्नाटक की भूत कोला परंपरा को दिखाकर दर्शकों को रोमांचित किया, तो ‘पुष्पा’ ने लाल चंदन की तस्करी को बेहद रोचक तरीके से पेश किया। ये फिल्में दर्शकों से गहराई से जुड़ने में सफल होती हैं।
4. स्टारडम से ज्यादा कंटेंट को महत्व देना
बॉलीवुड में जहां अक्सर स्टार पावर पर भरोसा किया जाता है, वहीं साउथ इंडस्ट्री अच्छी स्क्रिप्ट को ज्यादा महत्व देती है। सुपरस्टार भी नई और अलग कहानियों के हिसाब से खुद को ढाल लेते हैं। रजनीकांत, कमल हासन, अल्लू अर्जुन जैसे सितारे